Wednesday, March 16, 2022

लघुकथा जीवंत और गतिशील विधा है - अशोक लव

 •जीवंत व गतिशील विधा : लघुकथा (एक) / अशोक लव

 "लघुकथा हिंदी साहित्य की सर्वाधिक लोकप्रिय विधा है। असंख्य पाठकों और सैंकड़ों लेखकों ने इसे लोकप्रियता प्रदान की है। यह स्थिति दशकों से शनै:- शनै: विकसित हुई है।" -अशोक लव



    लघुकथा, कथा साहित्य की अन्य विधाओं यथा कहानी और उपन्यास के समान ही एक विधा है। कहानियों और उपन्यासों के विषय असीमित और विविधता लिए होते हैं, वही स्थिति लघुकथा की है। लघुकथा के कथ्य का कोई भी विषय हो सकता है। यह लेखक पर निर्भर है कि वह किसका चयन करता है। यह भ्रम नहीं होना चाहिए कि लघुकथाएँ इन विषयों पर ही लिखी जा सकती हैं।

लघुकथा नकारात्मक सोच की विधा नहीं है। सामाजिक स्थितियों, विसंगतियों, रूढ़ियों, व्यवस्थाओं, मानवीय भावनाओं, संबंधों, विचारों; धार्मिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थितियों पर साहित्य की अन्य विधाओं में भी लिखा जाता है; उन पर कटाक्ष भी किया जाता है; लघुकथा में भी ऐसा ही किया जाता है। इसलिए लघुकथा को नकारात्मक विधा कहना उचित नहीं है। लघुकथा का सकारात्मक अकाश उतना ही व्यापक है, जितना अन्य विधाओं का है।

प्रत्येक विधा का अपना व्याकरण होता है, अपना शास्त्र होता है; अपनी संरचना के मूलभूत स्वरूप के कारण उसकी विशेषता होती है। कहानी न तो उपन्यास है और व्यंग्य कहानी नहीं है। प्रत्येक विधा की संरचना उसके शास्त्रीय तत्त्वों के आधार पर होती है। कहानी में व्यंग्य हो सकता है, लघुकथा में भी व्यंग्य हो सकता है। इस आधार पर यह व्यंग्य विधा नहीं हो जाती। दोनों स्वतंत्र विधाएँ हैं। उनका अपना विशिष्ट संरचनात्मक स्वरूप है। कहानी और लघुकथा 'कथा' परिवार की विधाएँ तो है परंतु उनका स्वतंत्र अस्तित्व है। कहानी, लंबी या छोटी हो सकती है। परंतु छोटी कहानी लघुकथा नहीं बन जाती।

लघुकथा अपने आकारगत रूप के कारण लघुकथा कहलाई। इसलिए लघु होना, इसका महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। इसका निर्वाह अत्यंत आवश्यक होता है। लघुकथा का स्वरूप कितना लागू होगा, यह उसके कथ्य पर निर्भर है। लघुकथा पाँच-छह वाक्यों की हो सकती है तो सौ से दो सौ वाक्यों अथवा शब्दों की भी हो सकती है। यह लघुकथाकार की क्षमता और लेखकीय कौशल पर निर्भर है कि वह उसे कितना विस्तार देना चाहता है। वस्तुत: लघुकथा, लघुकथाकार की सामर्थ्य की पर्याय । उसके लेखन कौशल की परीक्षक है। एक ही विषय पर कहानी भी लिखी जा सकती है और लघुकथा भी। परिवार में वृद्धों की स्थिति पर अनेक कहानियाँ लिखी गई हैं और लघुकथाएँ भी लिखी गई है।

समसामयिक स्थितियों पर लघुकथाएँ अधिक लिखी जाती हैं। इसका कारण है कि लघुकथा किसी घटना के सूक्ष्म बिंदु पर केंद्रित रहती है। वह सूक्ष्मतम बिंदु अनावश्यक विस्तार नहीं चाहता। सामयिक घटना तुरंत घटती है और लघुकथा उसके मूल पर केंद्रित रहती हैं। इसमें विस्तार की संभावनाएँ रहती ही नहीं है। कुशल लेखक उसी सूक्ष्मतम मूल बिंदु को लेकर लघुकथा का ताना-बाना बुनता है। वह अल्प शब्दों में अपना उद्देश्य स्पष्ट कर देता है। किसी व्यक्ति की मनोदशा का चित्रण करने के लिए कालखंड का ध्यान रखना होता है। लघुकथा उस कालखंड में व्यक्ति की मनोदशा का चित्रण करती है। विषय कोई हों, लघुकथा कथ्य के चारों और ही भ्रमण करती है। इसलिए वह विस्तार से बचती है। जहाँ अनावश्यक विस्तार हुआ लघुकथा के बिखर जाने की संभावना बढ़ जाती है। अनावश्यक विस्तार के कारण उसके कहानी बन जाने की आशंका रहती है।

लघुकथा त्वरित गति की विधा है। लघुकथा विशाल नदी का मंद-मंद बेहतर प्रवाह नहीं अपितु निर्झर के उछलते जल का तीव्र प्रवाह है। लघुकथा की यात्रा कम-से-कम शब्दों की होती है। इसी लघु आकार में लघुकथाकार बिंबों, प्रतीकों, रूपकों और अलंकारों द्वारा इसके सौंदर्य को सजाता-सँवारता है।

लघुकथा, कथा साहित्य की समर्थ विधा है। इसके लघु स्वरूप में जीवन के विविध स्वरूपों, परिदृश्यों आदि को समाहित कर लेने की क्षमता है। लघुकथा सेल्फी द्वारा खींचा फोटोग्राफ़ है. सीमित और आवश्यक वस्तुओं का चित्र! यह सागर की गहराई और आकाश के विस्तार को अपने लघु स्वरूप में समा लेती है।

मानवीय संवेदनाओं का चित्रण करने वाली रचनाएँ अधिक प्रभावशाली होती हैं, श्रेष्ठता लिए रहती हैं। लघुकथा जहाँ तीख व्यंग्यों द्वारा हृदय को बेधने की क्षमता रखती है, वहीं अपनी संवेदना सामर्थ्य के कारण हृदय के मर्म का स्पर्श करने में सक्षम होती है। सातवें-आठवें दशक के आरंभिक कालखंड की अधिकांश लघुकथाएँ व्यवस्था और विसंगतियों पर तीखे व्यंग्य करती थी; शनै:-शनै उनमें मानवीय संवेदनाओं का पक्ष प्रबल होता गया और मानवीय संबंधों की लघुकथाएँ प्रचुर मात्रा में लिखी जाने लगीं। गत दो दशकों में इन की प्रधानता हो गई है। लघुकथा की लोकप्रियता का यह भी एक कारण है।

इस विधा के प्रसार के साथ लेखकों की भीड़ जुड़ती चली गई। इनमें से अधिकांश ने इस विधा के शास्त्रीय पक्ष पर ध्यान नहीं दिया और छोटे-छोटे प्रसंगों, चुटकुलों, गप्प-गोष्ठियों के किस्सों को लघुकथा का नाम देकर छपवाना आरंभ कर दिया। वर्तमान में लघुकथा के नाम पर ऐसी रचनाओं का अंबार लग गया है। यह स्थिति चिंताजनक है। केवल प्रकाशित हो जाने के मोह से लिखने वाले लघुकथा विधा का अहित कर रहे हैं। उन्हें न अपनी छवि की चिंता है न ही विधा की।

श्रेष्ठ लघुकथाओं को बार-बार पढ़ने का मन होता है। उन्हें जितनी बार पढें, वह उतना ही अद्भुत आनंद देती हैं। यह आवश्यक नहीं है कि सैकड़ों लघुकथाएँ लिखी जाएँ, जितनी भी लिखें उनका लघुकथा होना आवश्यक होता है।

श्रेष्ठ लेखक अपनी रचनाओं का प्रथम समीक्षक होता है। वह अपनी रचना को बार-बार पढ़ता है, उसे परिमार्जित करता है। वरिष्ठ और प्रतिष्ठित साहित्यकारों ने अपने अनुभवों में इसका वर्णन किया है। इसलिए सर्वप्रथम लघुकथाकारों को स्वयं ही अपनी लघुकथाओं का मूल्यांकन करना चाहिए।

लघुकथा की एक विशेषता है इसकी व्यंजना शक्ति। जिस तरह कविता में सपाटबयानी दोष मानी जाती है। उसी प्रकार 'आँखों देखा हाल' वर्णन करने वाली अभिधा शक्ति की लघुकथाओं को श्रेष्ठ नहीं समझा जाता। साहित्यकार अपने अनुभवों, अभ्यास और साधना के द्वारा श्रेष्ठ सृजन करते हैं।

लघुकथा विधा में समीक्षकों का संकट आरंभ से है । कुछ हैं जो स्वयं लघुकथाकार है, श्रेष्ठ लघुकथाकार हैं पर लघुकथा के मापदंडों से अनभिज्ञ होने के कारण मनचाही समीक्षाएँ कर रहे हैं। वरिष्ठ साहित्यकार और समालोचक डॉ० ब्रजकिशोर पाठक ने इस विषय में लिखा है—‘लघुकथा यदि साहित्य रचना विधान है तो इसमें भी ध्वन्यात्मकता होगी ही। प्रतीक, मिथक और अभिव्यक्ति की वक्रता को आम आदमी कैसे पचा सकता है? आम आदमी क्या. सहृदय समीक्षक के लिए भी कवि-साहित्यकार की संवेदना, अनुभूति और लेखक की मुद्रा को पकड़ना कठिन होता है। इसलिए समीक्षा वैयक्तिक होती है। आलोचक की वैयक्तिकता का प्रभाव पड़ने के कारण ही एक ही कृति को कई रूपों में विश्लेषित होना पड़ता है। इसलिए लघुकथा स्वातंत्रयोत्तर भारत की उपजी अनास्था और समाधानरहित समस्याओं से जुड़ी होने के बाद लोकप्रिय' नहीं हुई बल्कि इसे सहज विधा रचना मानकर रचनाधर्मियों ने भीड़ पैदा की है। इनमें अनावश्यक हंगामे में मूल्यांकन की दिशाहीनता भी देखने को मिली क्योंकि साहित्यिक रचनाधर्मिता से सीधा लगाव न होने के कारण शास्त्रविहीन लोग ही मूल्यांकनकर्ता बन गए।’ (साहित्यकार अशोक लव बहुआयामी हस्ताक्षर, पृष्ठ 18-19, वर्ष 2004)

इसी क्रम में डॉ ब्रजकिशोर पाठक का मानना है—‘...इन लोगों ने नाटक, उपन्यास और कहानी के तत्त्वों को लघुकथा पर आरोपित किया था और कथानक, चरित्र चित्रण, कथोपकथन आदि बातें लघुकथा पर आरोपित करके वस्तुतः साहित्यकारों को धर्मसंकट में डाल दिया था। यदि लघुकथा की आलोचना की जाए तो कहानी की समीक्षा हो जाएगी। लघुकथा की लकड़ी के बोटे से आरी चलाकर पटरी निकालना बेवकूफ़ी है। आलोचना को 'कथाकथ्य' (कथ्य और अकथ्य) की स्थिति में डालकर देना ही लघुकथा की सफलता है। यह 'कथाकथ्थय' (कथा और कथ्य) बहुत प्रचलित हुआ और 'कथाकथ्य' (कथा और कथ्य) के रूप में प्रयुक्त होने लगा। मेरे विचार से लघुकथा में 'कथानक' नहीं हो सकता। यहाँ एक प्रमुख स्थिति या घटना होती है। और उसी से अन्य छोटी-छोटी प्रासंगिक घटनाएँ और स्थितियाँ होती है। लघुकथा में चरित्र चित्रण नहीं होता; पात्र-योजना होती है। कथोपकथन नहीं होता संवाद होते हैं। कथानक के बदले 'घटना' लघुकथा में आकर 'कथाभास' के रूप में प्रयुक्त होती है। इस सूक्ष्म भेद के न जानने के कारण ही कुछ लघुकथाकार छोटी कहानी जैसी चीज़ लघुकथा के नाम पर लिखते रहे हैं।’ (साहित्यकार अशोक लव : बहुआयामी हस्ताक्षर, पृष्ठ 21-22, वर्ष 2004)

इसी तरह लघुकथा और कहानी में अंतर एकदम स्पष्ट हो जाता है। कथ्य और शिल्प दोनों दृष्टि से कहानी का कथानक लघुकथा की घटना की अपेक्षा व्यापकता लिए रहता है। उसकी शैली लघुकथा से भिन्न होती है। उसका विकास लघुकथा की भाँति नहीं होता। लघुकथा की गति और प्रवाह भिन्न होता है। लघुकथा का आरंभ उत्सुकता लिए रहता है, विकास इसे और बढ़ाता है और उसके कथ्य को गति प्रदान करता है। चरमसीमा पर वह लघुकथा का अंत हो जाता है। यहीं लघुकथा का अभीष्ट स्पष्ट हो जाता है।

‘लघुकथा कलश’ आलेख महाविशेषांक-1 (जुलाई-दिसंबर 2020, संपादक : योगराज प्रभाकर) में प्रकाशित

Monday, March 7, 2022

Ashok Lav Ki Laghukathayen --International Hindi Samiti America

INTERNATIONAL HINDI ASSOCIATION'S NEWSLETTER फरवरी 2022, अंक ९ प्रबंध सम्पादक: सुशीला मोहनका
अशोक लव नें दिल्ली विश्वविद्यालय और हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा ग्रहण की है। उन्होंने नेशनल म्यूजियम, नयी दिल्ली से ‘आर्ट एप्रीसियेशन’ कोर्स भी किया है। उनकी प्रथम रचना १९६३ में प्रकाशित हुई थी, उस समय वे स्कूल में पढ़ते थे। उन्होंने ३० वर्ष आध्यापन किया है। वे पत्रिकारिता के क्षेत्र में कार्य करते है। उनकी साहित्यिक और शैक्षिक लगभग १५० पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। अभी ये अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की भारत शाखा के दिल्ली अन.सी.आर. शाखा के अध्यक्ष है। उनकी दो लघुकथाएँ छोटे बच्चों के लिए नीचे दी जा रही है| दो लघुकथाएँ १) लघुकथा- पापा तो पापा होते हैं मानवी दूसरी कक्षा में पढ़ती थी। लॉकडाउन के पैंतीसवें दिन उसका धैर्य बिखरने-बिखरने को हो गया था। वह सारी स्थिति समझ रही थी। उसने हठ करना छोड़ दिया था अन्यथा प्रत्येक शनिवार वह हठ करके मम्मी-पापा को डिनर के लिए बाहर ले जाने पर विवश कर देती थी। उसने भाँति-भाँति की फ़रमाइशें बंद कर दी थीं। वह जानती थी मॉल बंद थे, बाज़ार बंद थे। अब मित्रों के साथ वीडियो-चैटिंग कर लेती थी। उसकी कक्षाएँ ऑनलाइन होती थीं। वह अपने गानों की वीडियो बनाती थी। पेंटिंग करती थी। वह लॉकडाउन का समय व्यतीत करना सीख गई थी। छह वर्ष की मानवी और कितना धैर्य रखती ! उसने पापा को कहा-"पापा, आज मैं आपके साथ दूध लेने जाऊँगी। मैं मास्क लगा लूँगी।" वह इसके आगे कुछ कहती परंतु उसका गला रुँध गया था। उसकी आँखों में आँसू तैरने लगे थे। "अरे, हमारी मानवी तो बहादुर बच्ची है। हम अभी एकसाथ दूध लेने चलेंगे। मदर डेयरी से चॉकलेट और आइसक्रीम भी लेंगे।"पापा ने उसे गले लगाते हुए कहा। पापा ने अपने आँसू रोक रखे थे क्योंकि वे पापा जो थे। २) लघुकथा - बेचारा जगदीश वृद्धा पत्नी पति को धमकाते हुए कह रही थी-" शुभम दूध लाने नहीं जाएगा।" वृद्ध जगदीश समझा रहा था-" टीवी पर बार-बार चेतावनी दी जा रही है, बार-बार समझाया जा रहा है, साठ वर्ष से अधिक के वरिष्ठ नागरिक घर से बाहर न निकलें। मैं तो सत्तर के हो गया हूँ।" नारायणी कहने लगी-" आपको कोरोना ने संक्रमित कर दिया तो क्या अंतर पड़ेगा शाखाओं के कार्यक्रम के रिपोर्ट अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति -- उत्तरपूर्वी ओहायो शाखा साहित्यिक संध्या, विश्व-हिंदी दिवस, जनवरी २०२२ डॉ. तस्नीम लोखंडवाला लेखन और प्रस्तुति डॉ. सुनीता द्विवेदी अनुवाद ‘अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की उत्तरपूर्वी ओहायो शाखा ने ‘विश्व हिंदी दिवस’ के उपलक्ष्य में रविवार, २३ जनवरी २०२२ को ज़ूम के माध्यम से आभासी ‘साहित्यिक-संध्या’ का आयोजन किया था। इस साहित्यिक संध्या का कुशल सञ्चालन श्रीमती रश्मि चोपड़ा और डॉ. सुनीता द्विवेदी ने किया था। इस कार्यक्रम में स्थानीय कवियों के आलावा भारत के तीन सुप्रसिद्ध साहित्यकारों और कवियों ने भी अपनी मौलिक रचनाओं का वाचन कर कार्यक्रम को रोचक और सफल बनाया। शाखा-प्रमुख डॉ. शोभा खंडेलवाल जी ने सभी अतिथियों और श्रोताओं का स्वागत किया। तत्पश्चात, शाखा की मातामही आदरणीय श्रीमती सुशीला मोहनका जी के आशीर्वचनों से साहित्यिक संध्या प्रारम्भ हुई। इस कार्यक्रम में प्रस्तुतियों की सुंदर शुरुआत भारत से आये प्रतिष्ठित कहानीकार माननीय डॉ. श्री अशोक लव जी की बहुत ही मार्मिक लघु-कथा - “भगवान सुनते हैं”, से हुई। इस कहानी में उन्होंने कोविड की महामारी के चलते श्रमिक-पलायन और अनजान लोगों की दया और उदारता का बहुत ही सजीव और मार्मिक चित्रण कर सभी सुनने वालों को भावुक कर दिया। भारत से आये सुप्रसिद्ध साहित्यकार, कवि, व्यंग्यकार और पत्रकार माननीय डॉ. श्री हरीश नवल जी ने अपने अद्भुत काव्य से श्री कृष्ण और कर्ण (स्वयं) के बीच के अंतर्द्वंद को बहुत ही सुंदर और तर्कनीय दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। ऎसे जटिल विषय पर इतने सुंदर काव्य की रचना डॉ. नवल जी और उनके समरूप साहित्यकारों को ही सुलभ है। उनकी दूसरी काव्य रचना - “अग्नि साक्षी” में उन्होंने एक बार फिर शब्दों के मायाजाल से अग्नि के विभिन्न स्वरूपों के चित्रण से सभी का मन मोह लिया। सुप्रसिद्ध कवयित्री और साहित्यकार, लखनऊ-निवासी डॉ. श्रीमती अर्चना श्रीवास्तव जी की अनूठी और रोचक, आँखों पर छायाचित्र-प्रस्तुति ने आभासी-प्रांगण को मंत्रमुग्ध कर दिया। छायाचित्रों के माध्यम से उन्होंने “आँखों” द्वारा विभिन्न अभिव्यक्तियों को छंदों में बाँध कर अपने काव्य-पांडित्य से सभी को प्रभावित कर दिया। सचेतन “ख़ारी स्याही में भीगे शब्दों का काफिला” सभी दर्शकों को इस सरिता में बहा ले गया। आंखों और पलकों के आपसी स्नेह से ओतप्रोत उनकी दूसरी रचना से सभी को मंत्रमुग्ध कर एक बार फिर अपने असीम साहित्यिक कौशल और उत्कृष्ट दृष्टिकोण का परिचय दिया। विश्व-प्रसिद्ध और माननीय कवियों और साहित्यकारों की उत्कृष्ट रचनाओं को सुन आभासी-सभागृह के दर्शक पूर्णतः मंत्रमुग्ध हो चुके थे। कार्यक्रम को गति देने सूत्रधारों ने स्थानीय कवियों को अपनी मौलिक रचनाओं के पाठन हेतु आमंत्रित किया। क्लीवलैंड की वरिष्ठ कवयित्री श्रीमती विमल शरण जी ने सदैव की तरह, दिल को छूने वाली, शब्दों से अलंकृत काव्य रचना “अमेरिका में पहला हिमपात - प्रथम अनुभव” प्रस्तुत की। बर्फ से ढंकी सृष्टि में कहीं दिखाई दी हरियाली के माध्यम से जीवन के सकारात्मक मर्म को उन्होंने बहुत ही कुशलता से कविता का रूप दे दिया। अगली प्रस्तुति में डॉ. तस्नीम लोखंडवाला जी ने “एक योजक चिन्ह हूँ मैं” शीर्षक कविता से प्रवासी-भारतीयों की मनःस्थिति को अत्यंत कुशलतापूर्वक रची, अनोखी कविता के रूप में प्रस्तुत कर सदन में उपस्थित प्रत्येक हृदय में स्पंदन उत्पन्न कर दिया। श्रीमती रेणु चढ्ढा जी ने अपने अनुपम, भावपूर्ण कविता - “तन हारा, मन जीता”, से सभी दर्शकों को न सिर्फ मोहित किया, अपितु अपनी अलंकृत रचना के माध्यम से सशक्त लेखनी का भी परिचय दिया। उनकी पंक्ति, “गीली मिट्टी कलश बनाये” इस बात का उत्कृष्ट प्रमाण है। श्रीमती विम्मी जैन जी ने “हिंदी मेरी भाषा” शीर्षक वाली रोचक कविता के माध्यम से मातृभाषा हिंदी के प्रति अपने प्रेम और गर्व का मनोहरी चित्रण प्रस्तुत कर ‘विश्व हिंदी दिवस’ के आयोजन को अपनी काव्यांजलि के उपहार से साकार बना दिया। श्रीमती वंदना भरद्वाज जी अक्सर अपनी तीखी कलम से सामाजिक कुरीतियों पर काव्यात्मक प्रहार करतीं हैं। इस बार उन्होंने एक अलग विषय पर बहुत सुंदर काव्य-गद्य प्रस्तुत कर समस्त सुनने वालों को अपनी जन्मभूमि में बीते बचपन की मधुर स्मृतियों और सरल ज़िंदगी की सैर करवा दी। उनकी कविता - “ये मेरी ज़िन्दगी” इस सरल जीवन से अनभिज्ञ युवा पीढ़ी के लिए एक अनमोल उपहार है। पर्यावरण-प्रिय और माननीय कवि एवं शायर डॉ. उत्सव चतुर्वेदी जी ने अपनी कटाक्ष रचना - “चिड़ियों के दाने” के माध्यम से मानव द्वारा पर्यावरण के विनाश का विवरण सुना सभी दर्शकों को आत्मग्लानि का बोध कराया। उनकी पंक्ति, “उनका (चिड़ियों का) हक उन्हीं को दे रहा हूँ” मन-मस्तिष्क पर तीखा प्रहार करती है और “रेत में सिर छुपाये शुतुरमुर्ग” की उपमा को साकार करती है। इस संध्या की अंतिम रचना डॉ. सुनीता द्विवेदी की थी। अपनी कविता - “पादुका” के माध्यम से उन्होंने एक स्त्री के जीवन को दर्शाया जो समाज के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर देती है, समाज के प्रहार सहती है, अपना पक्ष कहने का अवसर ढूंढती रहती है लेकिन दोगले समाज पर मुस्कुरा कर अंततः मौन ही रह जाती है। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति की उत्तरपूर्वी ओहायो शाखा की अध्यक्षा महोदया श्रीमती किरण खेतान जी ने धन्यवाद ज्ञापन किया । उन्होंने सभी माननीय अतिथियों, और कवियों को इस कार्यक्रम के सफल आयोजन के लिए बधाई दी और धन्यवाद प्रकट किया। आभासी पटल से जुड़े सभी दर्शकों को भी साभार धन्यवाद दिया। अंत में, इस कार्यक्रम के निर्बाध सञ्चालन हेतु श्रीमती प्रेरणा खेमका जी, श्रीमती अलका खंडेलवाल जी, श्री अशोक खंडेलवाल जी, श्री अजय चढ्ढा जी, श्री पवन खेतान जी, डॉ. शोभा खंडेलवाल जी तथा अन्य आयोजकों, व तकनीकी टीम के सदस्यों के प्रति धन्यवाद प्रकट किया। ***